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	Comments on: રિ-વિઝન	</title>
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	<description>એક નવી રચના, મહિનાના દર પહેલા અને ત્રીજા શનિવારે...</description>
	<lastBuildDate>Fri, 07 Aug 2009 16:37:13 +0000</lastBuildDate>
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		<title>
		By: દક્ષેશ		</title>
		<link>https://vmtailor.com/archives/499/comment-page-1#comment-62175</link>

		<dc:creator><![CDATA[દક્ષેશ]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Aug 2009 16:37:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[આ ગઝલ એથી લખી કે શ્વાસ તારા નામના
જો નથી મારા તો મારી પાસ રાખી ના શકું ... 

વાહ, ક્યા બાત હૈ.. આખી ગઝલ, બધા જ શેરો કાબિલે તારીફ છે.

ખીલી છે મૌનની મોસમ, તમે ક્યારેક તો વાંચો .... મજા પડી ગઈ.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>આ ગઝલ એથી લખી કે શ્વાસ તારા નામના<br />
જો નથી મારા તો મારી પાસ રાખી ના શકું &#8230; </p>
<p>વાહ, ક્યા બાત હૈ.. આખી ગઝલ, બધા જ શેરો કાબિલે તારીફ છે.</p>
<p>ખીલી છે મૌનની મોસમ, તમે ક્યારેક તો વાંચો &#8230;. મજા પડી ગઈ.</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: Dr Nishith Dhruv		</title>
		<link>https://vmtailor.com/archives/499/comment-page-1#comment-60818</link>

		<dc:creator><![CDATA[Dr Nishith Dhruv]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Jul 2009 17:09:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गझलना फेफसांमां – गझलनां फेफसांमां]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>गझलना फेफसांमां – गझलनां फेफसांमां</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: डॉ. निशीथ ध्रुव		</title>
		<link>https://vmtailor.com/archives/499/comment-page-1#comment-60753</link>

		<dc:creator><![CDATA[डॉ. निशीथ ध्रुव]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Jul 2009 13:33:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रचना चोथी : आ रचना विषे शुं लखवुं? बस, पीळा पीळा शब्दोनी पीळी गूंथणीने माणता रहीए, पीळचट्टा दृश्योनी पीळी गरमीथी शेकाता रहीए अने पीळो गरमाळो जोता रहीए. अत्यन्त कर्णमधुर रचना - कोईक एने तालबद्ध करे तो अद्भुत लागे.
ઊનાળો - ઉનાળો
પીળુકડા-પીળવત્તર-પીળમજી चारथी वधु अक्षरना शब्दो छे माटे नियमानुसार પિળુકડા-પિળવત્તર-પિળમજી होवा जोईए एम लागे छे पण कोशमां जोवा न मळ्या तेथी निश्चित कही नथी शकतो. कोईक जाणकार प्रकाश पाडी शके.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>रचना चोथी : आ रचना विषे शुं लखवुं? बस, पीळा पीळा शब्दोनी पीळी गूंथणीने माणता रहीए, पीळचट्टा दृश्योनी पीळी गरमीथी शेकाता रहीए अने पीळो गरमाळो जोता रहीए. अत्यन्त कर्णमधुर रचना &#8211; कोईक एने तालबद्ध करे तो अद्भुत लागे.<br />
ઊનાળો &#8211; ઉનાળો<br />
પીળુકડા-પીળવત્તર-પીળમજી चारथी वधु अक्षरना शब्दो छे माटे नियमानुसार પિળુકડા-પિળવત્તર-પિળમજી होवा जोईए एम लागे छे पण कोशमां जोवा न मळ्या तेथी निश्चित कही नथी शकतो. कोईक जाणकार प्रकाश पाडी शके.</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: डॉ. निशीथ ध्रुव		</title>
		<link>https://vmtailor.com/archives/499/comment-page-1#comment-60746</link>

		<dc:creator><![CDATA[डॉ. निशीथ ध्रुव]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Jul 2009 13:11:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विवेक, आपणे हर्ष अने खेदनी पेले पार जईने आपणी मातृभाषानी सेवा करवानी भावना ज सम्पोषीए.
ग़ज़ल त्रीजी : जीवनने निहाळवाना सौना पोतपोताना दृष्टिकोण होय ज. अने दरेक व्यक्ति पोताना दृष्टिकोणना चतुष्कोणी ओरडामा केद थई जाय छे. ओरडो चोरस होय तो एना खूणामां कचरो थोडोक तो शेष रहे ज, गोळ ओरडो स्वच्छ करवो आसान छे. परिणामे जन्मे निरागस व्यक्ति जेम मोटी थाय तेम तेनो चोरस कमरो वधु मलिन थाय. कमळाना दर्दीने बधुं पीळुं देखाय तेम चोरस ओरडामां बन्ध मानवने फूल-आभ बधुंय चोरस देखाय छे. छतां ए गूंगळायेला वातावरणमां पण मानवनुं हैयुं धबके छे - एनां फेफसां श्वसे छे अने एना श्वासे श्वासे शब्दो रचाय छे अने एमांथी गूंथाय छे एक मनमोहक ग़ज़ल - जेवी के विवेके रचीने आपणने आपी छे. एक पछी एक ग़ज़लोनां पानां खडकाय छे अने एना श्वासनी लहेरखीथी ज फफडतां रहे छे. एक दृश्य ऊभुं थाय छे - वाह! कमालनी रचना छे.
घणा दृश्यो - घणां दृश्यो
पानां ऊंचा-नीचा  - पानां ऊंचां-नीचां
गझलना फेफसांमां - गझना फेफसांमां
एम त्रण ठेकाणे अनुस्वारनी भूल सुधारी लेजो.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>विवेक, आपणे हर्ष अने खेदनी पेले पार जईने आपणी मातृभाषानी सेवा करवानी भावना ज सम्पोषीए.<br />
ग़ज़ल त्रीजी : जीवनने निहाळवाना सौना पोतपोताना दृष्टिकोण होय ज. अने दरेक व्यक्ति पोताना दृष्टिकोणना चतुष्कोणी ओरडामा केद थई जाय छे. ओरडो चोरस होय तो एना खूणामां कचरो थोडोक तो शेष रहे ज, गोळ ओरडो स्वच्छ करवो आसान छे. परिणामे जन्मे निरागस व्यक्ति जेम मोटी थाय तेम तेनो चोरस कमरो वधु मलिन थाय. कमळाना दर्दीने बधुं पीळुं देखाय तेम चोरस ओरडामां बन्ध मानवने फूल-आभ बधुंय चोरस देखाय छे. छतां ए गूंगळायेला वातावरणमां पण मानवनुं हैयुं धबके छे &#8211; एनां फेफसां श्वसे छे अने एना श्वासे श्वासे शब्दो रचाय छे अने एमांथी गूंथाय छे एक मनमोहक ग़ज़ल &#8211; जेवी के विवेके रचीने आपणने आपी छे. एक पछी एक ग़ज़लोनां पानां खडकाय छे अने एना श्वासनी लहेरखीथी ज फफडतां रहे छे. एक दृश्य ऊभुं थाय छे &#8211; वाह! कमालनी रचना छे.<br />
घणा दृश्यो &#8211; घणां दृश्यो<br />
पानां ऊंचा-नीचा  &#8211; पानां ऊंचां-नीचां<br />
गझलना फेफसांमां &#8211; गझना फेफसांमां<br />
एम त्रण ठेकाणे अनुस्वारनी भूल सुधारी लेजो.</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: વિવેક		</title>
		<link>https://vmtailor.com/archives/499/comment-page-1#comment-60713</link>

		<dc:creator><![CDATA[વિવેક]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Jul 2009 12:13:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ત્રણેય વાત સહર્ષ અને સખેદ સ્વીકારું છું. સહર્ષ એટલા માટે કે આપે ફરી મારી ચાર રચનાઓની ક્ષતિ દૂર કરવામાં પથદર્શકનો ભાગ ભજવ્યો અને સખેદ એટલા માટે કે હું એ તબક્કે પહોંચી શક્તો નથી, જ્યાં આપે વિશ્વાસપૂર્વક &quot;માત્ર&quot; કવિતા માણવાની જ રહે... 

કંટાળાજન્ય શબ્દ પ્રયોગ ઉતાવળમાં થઈ ગયો અને પ્રતિભાવમાં આપનું નામ જોતાંની સાથે યાદદાસ્તની ક્ષિતિજ પર ઝબક્યું કે આ જ લોચો આ વખતે લાગ્યો લાગે છે...

બાકીની બે ભૂલ મૂળ ગઝલમાં સુધારી લઉં છું... 

આભાર...]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ત્રણેય વાત સહર્ષ અને સખેદ સ્વીકારું છું. સહર્ષ એટલા માટે કે આપે ફરી મારી ચાર રચનાઓની ક્ષતિ દૂર કરવામાં પથદર્શકનો ભાગ ભજવ્યો અને સખેદ એટલા માટે કે હું એ તબક્કે પહોંચી શક્તો નથી, જ્યાં આપે વિશ્વાસપૂર્વક &#8220;માત્ર&#8221; કવિતા માણવાની જ રહે&#8230; </p>
<p>કંટાળાજન્ય શબ્દ પ્રયોગ ઉતાવળમાં થઈ ગયો અને પ્રતિભાવમાં આપનું નામ જોતાંની સાથે યાદદાસ્તની ક્ષિતિજ પર ઝબક્યું કે આ જ લોચો આ વખતે લાગ્યો લાગે છે&#8230;</p>
<p>બાકીની બે ભૂલ મૂળ ગઝલમાં સુધારી લઉં છું&#8230; </p>
<p>આભાર&#8230;</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: डॉ. निशीथ ध्रुव		</title>
		<link>https://vmtailor.com/archives/499/comment-page-1#comment-60710</link>

		<dc:creator><![CDATA[डॉ. निशीथ ध्रुव]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Jul 2009 12:05:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ग़ज़ल बीजी : प्रथम ग़ज़लमां समाधि पछीय न मळता समाधाननी वात छे तो आ ग़ज़लमां जीवनमां डगले ने पगले करवा पडता समाधाननी वात छे. पण ए समाधानमां लाचारी नथी, वास्तवनो स्वीकार छे अने ते पण एनुं औचित्य समजीने. जे समाज आवा समाधानने समजतो अने आचरतो थाय ते समाजमां समज अने शान्ति स्थपाय अने आवा ज समाजमां उत्कर्ष थाय, संस्कृतिनां नवां सोपानो सर थाय. आ तो मारुं अर्थघटन छे. आवां अर्थघटनो प्रस्तुत थयां करे तो एक ज ग़ज़लमांथी अनेक सघन अर्थो मळी रहे अने आपणी विचारसृष्टि तथा कल्पनासृष्टि विस्तार पामे. धन्यवाद, विवेक.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ग़ज़ल बीजी : प्रथम ग़ज़लमां समाधि पछीय न मळता समाधाननी वात छे तो आ ग़ज़लमां जीवनमां डगले ने पगले करवा पडता समाधाननी वात छे. पण ए समाधानमां लाचारी नथी, वास्तवनो स्वीकार छे अने ते पण एनुं औचित्य समजीने. जे समाज आवा समाधानने समजतो अने आचरतो थाय ते समाजमां समज अने शान्ति स्थपाय अने आवा ज समाजमां उत्कर्ष थाय, संस्कृतिनां नवां सोपानो सर थाय. आ तो मारुं अर्थघटन छे. आवां अर्थघटनो प्रस्तुत थयां करे तो एक ज ग़ज़लमांथी अनेक सघन अर्थो मळी रहे अने आपणी विचारसृष्टि तथा कल्पनासृष्टि विस्तार पामे. धन्यवाद, विवेक.</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: डॉ. निशीथ ध्रुव		</title>
		<link>https://vmtailor.com/archives/499/comment-page-1#comment-60666</link>

		<dc:creator><![CDATA[डॉ. निशीथ ध्रुव]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Jul 2009 09:21:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ग़ज़ल पहेली : समाधीथी आम तो समाधान मळे - पण अहीं तो कया प्रकारनी समाधि हती एनी मूंझवण छे. जीवननी सफ़रमां आगेकदम बढावीने पोताना हमसफ़रने वीसरी जनारनी यादमां व्यथानी गङ्गा आंसु बनीने वही रही छे. समाधिथी ज्ञाननो प्रकाश मळे - पण आ ते केवो प्रकाश जेनाथी कंई ज प्रकाशित थतुं नथी! पलांठी वाळीने मात्र पग नथी दुःख्या - आखुंय मनोविश्व दुःखमय बनी गयुं छे. सम्पूर्ण सुखमय जीवन जीवनाराने पण बे घडी दुःखना दरियामां डुबाडी नाखनारा शब्दो जेमने आवो अनुभव थयो होय तेमनी शी हालत करी नाखे एनी तो कल्पना ज करवी रही!
भरत पण्ड्याए कह्युं छे के सारुं वांचवुं के भूलो गोतवी ए वाचके पोते ज नक्की करवानुं. पण काव्यने माणीने पछी एना लिखित स्वरूपने संशुद्ध करवानो प्रयत्न थाय तो तेथी आपणी भाषानी ज सेवा थशे. अने विवेके अत्यार सुधी जोडणी-भूलो चींधवाना दरेक प्रयासने  खुल्ले मने आवकार्यो छे. माटे ज अहीं चींधुं छुं के આંખના પલાશવન नहीं આંખનાં પલાશવન जोईए. अने ઊજાળી नहि ઉજાળી जोईए.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ग़ज़ल पहेली : समाधीथी आम तो समाधान मळे &#8211; पण अहीं तो कया प्रकारनी समाधि हती एनी मूंझवण छे. जीवननी सफ़रमां आगेकदम बढावीने पोताना हमसफ़रने वीसरी जनारनी यादमां व्यथानी गङ्गा आंसु बनीने वही रही छे. समाधिथी ज्ञाननो प्रकाश मळे &#8211; पण आ ते केवो प्रकाश जेनाथी कंई ज प्रकाशित थतुं नथी! पलांठी वाळीने मात्र पग नथी दुःख्या &#8211; आखुंय मनोविश्व दुःखमय बनी गयुं छे. सम्पूर्ण सुखमय जीवन जीवनाराने पण बे घडी दुःखना दरियामां डुबाडी नाखनारा शब्दो जेमने आवो अनुभव थयो होय तेमनी शी हालत करी नाखे एनी तो कल्पना ज करवी रही!<br />
भरत पण्ड्याए कह्युं छे के सारुं वांचवुं के भूलो गोतवी ए वाचके पोते ज नक्की करवानुं. पण काव्यने माणीने पछी एना लिखित स्वरूपने संशुद्ध करवानो प्रयत्न थाय तो तेथी आपणी भाषानी ज सेवा थशे. अने विवेके अत्यार सुधी जोडणी-भूलो चींधवाना दरेक प्रयासने  खुल्ले मने आवकार्यो छे. माटे ज अहीं चींधुं छुं के આંખના પલાશવન नहीं આંખનાં પલાશવન जोईए. अने ઊજાળી नहि ઉજાળી जोईए.</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: डॉ. निशीथ ध्रुव		</title>
		<link>https://vmtailor.com/archives/499/comment-page-1#comment-60644</link>

		<dc:creator><![CDATA[डॉ. निशीथ ध्रुव]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Jul 2009 08:27:03 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अरे विवेक - आ बधु कण्टाळाजन्य कई रीते होई शके? कण्टाळाजन्य=कण्टाळामांथी जन्मेलुं! कदाय तमारा कहेवानो आशय हतो &quot; कण्टाळाजनक&quot;! अने आ बधुं कण्चाळाजनक पण कई रीते नीवडे?
पलावशन ए छापभूल छे ए मने पण नहोतुं समजायुं - पलाशवन हशे एनो अन्दाज मने खरे ज आव्यो नहोतो.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अरे विवेक &#8211; आ बधु कण्टाळाजन्य कई रीते होई शके? कण्टाळाजन्य=कण्टाळामांथी जन्मेलुं! कदाय तमारा कहेवानो आशय हतो &#8221; कण्टाळाजनक&#8221;! अने आ बधुं कण्चाळाजनक पण कई रीते नीवडे?<br />
पलावशन ए छापभूल छे ए मने पण नहोतुं समजायुं &#8211; पलाशवन हशे एनो अन्दाज मने खरे ज आव्यो नहोतो.</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: Neela		</title>
		<link>https://vmtailor.com/archives/499/comment-page-1#comment-60448</link>

		<dc:creator><![CDATA[Neela]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Jul 2009 19:34:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[રી-વિઝન સ-રસ છે.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>રી-વિઝન સ-રસ છે.</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: sudhir patel		</title>
		<link>https://vmtailor.com/archives/499/comment-page-1#comment-60344</link>

		<dc:creator><![CDATA[sudhir patel]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Jul 2009 20:58:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[સુંદર કાવ્યો. &#039;અખંડઆનંદ&#039; વાળી ગઝલ વધુ ગમી.
સુધીર પટેલ.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>સુંદર કાવ્યો. &#8216;અખંડઆનંદ&#8217; વાળી ગઝલ વધુ ગમી.<br />
સુધીર પટેલ.</p>
]]></content:encoded>
		
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